लाडकी
बचपन से देखा, एक नन्ही सी जान को,
बेशुमार खुशियां बटोरे प्यार भरी लाड को,
एक मज़ा सा था उसमे, कुछ तो बात थी,
यूं ही नहीं सब में शामिल रहती, सब को संजोए खिलखिलाती थी,
बड़ी चंचल और सबसे शैतान,
न सिर्फ हम बच्चो की बल्कि सभी की दुलारी वो,
आज जा रही है ब्याह रचने, हाथों में मेहंदी लगाके, एक नाम रचके,
जा रही है आज एक नया घर बसाने, मां से सीखकर, एक प्रथा और, आगे बढ़ाने,
चुन चुन के वहा सुंदर मोतियों से, ऐसी कलाकारी करना,
के घर भी रौनक हो जाए तेरी खिलखिलाहट से,
अगर हाथ से कोई डोरी छूट भी जाए, तो डरना मत,
वो डोरी है क्युकी तेरी पहचान, ढल जाएगी तेरे ही किसी और रंग में,
एक पल ठहर कर मज़बूत सी गांठ ज़रूर बांध देना,
पीहर में जैसे मां ने बसाया, और ससुराल में जैसे सास ने बांधा,
उसी घर को अपने प्यार और मजबूती से निहार देना,
एक ऐसा वातावरण, एक ऐसा माहौल बनाना, जिसमे तेरा परिवार सुखी रहे,
भेज रहे हम एक ऐसे जहां में, जहा मोतियों से पिरोएगी तू खुशियां,
जहां नन्ही किलकारियों से, फिर से बिखेर देगी तू खुशियां।
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